Sunday, July 8, 2012

वास्तविकता


रात के दो बज रहे है ...
दोपहर में बारिश हुई थी..
और सड़क धुली धुली लग रही है...
चाँद शरमा कर काले बादलो से परदा कर रहा है.. 


खिड़की खुली हुई है...
मीठी मीठी हवा आ रही है ..
गीली मिट्टी की भीनी खुशबू है, 
या शायद उसके बाल खुले है..
अंतर करना मुश्किल हो रहा है...


उसके घर का चक्कर काटा अभी हमने...
अंदर बत्ती जल रही थी, और गाना चल रहा था..
"गली में आज चाँद निकला......" 
मानों अंदर बैठा चाँद बाहर निकलने को बैताब है ..


उसी के घर के सामने कुछ देर इंतज़ार किया...
शायद चाँद सही मे बाहर निकले...
अफ़सोस, ये भी पर्दो के पीछे ही रहा...
और अगली धुन सुनाई दी .."आज जाने कि ज़िद्‍द ना करो
हमसे और वहाँ रुका ना गया |


ख़यालों और हक़ीकत में बहुत फ़र्क होता है, 
ख़याल है जो उपर बुन दिए है, 
हक़ीकत है, कि बैठे है हम अपनी स्क्रीन के सामने, 
बुन रहे है कुछ ख़याल  
चाय की चुस्की लेने को दिल है बैताब, लेकिन है नही किसी का साथ |


और वास्तविकता ऐसी है, जो किसी से बयान भी ना कर पाएँगे |

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