Thursday, July 16, 2020

नदी

तुम उस नदी जैसी हो 
जो एकदम शीतल
कलकलाहट करती हुई 
बहती रहती है

कहां से आ रही है,
उन पहाड़ों के पीछे से 
और कहां, कौनसे
समंदर में समा जाएगी
ये नहीं पता मुझे

पर उसी के किनारे बैठ कर 
पूरी बस्ती बसी है मेरी
और जब-जब ये नदी
बहना बंद कर देती हो, 
तो वो बस्ती उजड़ जाती है ।

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