तुम उस नदी जैसी हो
जो एकदम शीतल
कलकलाहट करती हुई
बहती रहती है
कहां से आ रही है,
उन पहाड़ों के पीछे से
और कहां, कौनसे
समंदर में समा जाएगी
ये नहीं पता मुझे
पर उसी के किनारे बैठ कर
पूरी बस्ती बसी है मेरी
और जब-जब ये नदी
बहना बंद कर देती हो,
तो वो बस्ती उजड़ जाती है ।
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