जर्जर हो चुकी वो इमारत
जहाँ छत टपकती रहती है
किच-किच करती खटिया पे
माँ बच्चे को जनम देती है
सरकारी दफ़्तर के खातों में
नाम दर्ज हो जाता है
जहाँ बाबू लोगों से ज़्यादा
दीमक निवास करती है
उबड़ खाबड़ ब्लैक बोर्ड पे
घिसे चाक के टुकड़ो से
पक्की सड़को के बनने के
नैनो में जो सपने भरते है
हाँ, इसी विशाल भारत में
एक ऐसा भी भारत बसता है
जिसका खुदका कोई भविष्य नहीं
पर वो भारत का भविष्य कहलाता है |
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