रोज़ रोज़ की इस भगदड़ में
अब जीने का ही वक्त नही है
फिर भी दो पल चुराते है,
सोचते है
क्या क्या बदला ?
क्या बदल रहा है ?
और क्या बदलेगा ?
क्या, कुछ था आपस हमारा वास्ता
जो बस बनके रह गया है औपचारिकता ?
कला प्रेमी है, कला की कद्र करनी सीखी, कुछ साथी थे जिन्होने हमे भी कलाकार का दर्जा दिलवा दिया था, उस दर्जे को संभालने की एक छोटी कोशिश ...