Monday, January 22, 2018

बंदर

नहीं नहीं, हम आज भी बंदर ही है 
इंसान तो कभी बन ही नही पाए 
इंसान बनने की तो बस ग़लतफमी हो गयी थी 


Darwin ना हो गये, की कोई बड़के Scientist 
अब आप ही बतलाओ 

गर हम इंसान होते, और बंदर ना होते 
तो थोड़े ना हम नकलची होते...
ये copy-paste का चलन
ये नक़लचिपन ही तो है..

ये बंदर ही तो है ..
हम बंदर ही तो है ..

और तो और, अगर हम बंदर ना होते 
तो थोड़े ना बापू हमको 
तीन बंदरों वाला सिधान्त देते 

हाँ, पर ये ज़रूर है की 
वो सिधान्त थोड़ा बदल गया है 
वो अब
बुरा ना देखो, बुरा ना सुनो, बुरा ना बोलो नहीं रहा 
वो अब 
कुछ ना देखो, कुछ ना सुनो, कुछ ना बोलो, हो गया है |

Saturday, December 31, 2016

नया साल

कभी कभी सोचता हूँ, 
ये समय क्या है ?

क्या ये समंदर है
जो शायद भरा हुआ है इन
लम्हों रूपी छोटी छोटी बूँदो से...

लम्हें..
जो मिल जाए तो बना देते है 
रात और दिन, शाम-ओ-सहर

लम्हें..
जो मिल जाए तो बना देते है
हफ्ते, महीनें और मौसम...

लम्हें..
जो मिल जाए तो बना देते है
साल, सदी, और जुग...

पर इस समंदर का किनारा कहाँ है 
और इसके किनारे कौन बैठा है 
क्या कोई इसके किनारे पहुँचा भी है 

या फिर मैं, तुम, हम सब.. 
इस समंदर की लहरों में बहते जा रहे है

अगर ऐसा ही है तो फिर 
मैं भी वही हूँ
तुम भी वही हो
हम सब वही है 
ये समंदर भी वही है 
तो फिर ये साल नया कहाँ से आ रहा है ?


-अंकित कोचर 

Tuesday, July 12, 2016

कश्मीर




मुझे नहीं समझ घाटी की  
वहाँ की सुंदर वादियों की 
वहाँ से बहती नदियों की  
वहाँ की राजनीति की  
वहाँ रहने वाले लोगो की 
और उनके सोच की  
वहाँ हुए पंडित निष्क्रमण की 
वहाँ हुए मानव अधिकारों के शोषण की  
वहाँ पनप रहे आतंकवाद की  
वहाँ पनप रहे अलगाववाद की  
वहाँ रहे राम या रहीम की  
मुझे समझ है, तो बस  
इंसान और इंसानियत की 
इंसान है, उसे इंसान रहने दो 
नागरिक, सैनिक या आतंकवादी में मत बाँटो |  

Friday, July 8, 2016

लिखना बाकी है


कभी लगता है जैसे कि  
बहुत कुछ पा लिया है
और अगले पल जैसे कुछ नहीं,  
अभी बहुत कुछ पाना बाकी है |  
 
कभी लगता है जैसे कि  
ख्वाब देखे है बहुत और कुछ उनमें पूरे हुए है  
पर अभी भी बहुत देखने 
और बहुत पूरे होने बाकी है |  
 
कभी लगता है की जज़्बात जो  
स्याही के साथ घुलकर पन्नो पे उतरते थे  
अब ख़तम हो गये है, पर अगले पल लगता है जैसे  
अभी उन्हें कीबोर्ड की ठक-ठक से ब्लॉग पे उतरना बाकी है |  
 
काफ़ी समय से कुछ लिखा नहीं 
तो मानों ऐसा लगता है  
जैसे लिखना छोड़ दिया है  
पर ऐसा नहीं है, अभी बहुत कुछ लिखना बाकी है | 

Saturday, August 15, 2015

आज़ाद


कुछ टूटे फूटे सपने लेकर  
उड़ान भर तो ली है हमने  
 
मंज़िल कब, और कहाँ मिलेगी 
इसकी खबर नहीं है हमको  
 
मंज़िल मिले, या ना मिले  
इसकी फ़िक्र भी नहीं है हमको  
 
आज़ाद है हम, परिंदो की तरह  
पिंज़रो में हमें अब क़ैद ना रख पाओगे | 

Monday, January 26, 2015

गणतंत्र स्वतन्त्र

अन्न है, पर भूख मिटाने को रोटी नहीं |
घर है, पर सर ढकने को छत नहीं |
पानी है, पर बुझती उससे प्यास नहीं |
पीपल है, पर मिलती उसकी छाँव नहीं |
तन है,  पर ढकने को वस्त्र नही |

गणतंत्र है,  पर शायद स्वतन्त्र नहीं |

Sunday, January 25, 2015

ओबामा

मैं आऊँगा कभी
यूँ ही लाल किले पे
एक गणतंत्र दिवस पे
जवानों की कदमताल देखने
थल, जल, और वायु सेना का
शक्ति प्रदर्शन देखने
हर राज्य की झाँकी देखने
उनकी संस्कृति देखने |

मैं आऊंगा यूँही कभी
लाल किले पे
तिरंगे को लहरता देखने
राष्ट्रगान सुनने
देश का गुणगान सुनने
जय हिंद का गूँज सुनने |

हाँ मैं ज़रूर आऊंगा
लाल किले पे, यूँ ही कभी
बिना किसी के बुलावे पे
ना कोई ताम-झाम किए
ना कोई ड्रामा किए
ना कोई डिजाइनर जामा पहने
और ना किसी ओबामा को संग लिए |