कवि महाशय,
ये जो विचार है, थोड़े सस्ते है
कुछ मोती-वोती सजाइए इनमें
तब जाके कुछ भाव लगेंगें
तब जाके किसी बाज़ार मे बिकेंगें |
प्रकाशक महोदय,
गुस्ताख़ी माफ़ करना
जिस बाज़ार में, आदमी बिकता है
उस बाज़ार में बिकने से भला
ये विचार मेरे ज़हन में ही अच्छे है |
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