हर सुबह नहा धो कर
शहर से दूर,
उँची इमारतों के जंगल में
मुखौटे पहन के
झूठी मुस्कानें चढ़ाके
ना जाने कौन कौन
भटकते रहते है वहाँ
वो जंगल बड़ा लुभावना है
शीशे लगे है इमारतों पे
वातानुकूलित कमरे है
पर वहाँ बैठ के हर कोई,
फोन, पिंग, और मेल पे
सामने वाले का काटते है
ना जाने किस तलाश में
रोज़ खुदको ही खोते रहते है
और, हर सुबह उठ, नहा धो कर
शहर से दूर, इमारतों के जंगल में
एक मौत वो मरते है |
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