Sunday, February 17, 2013

कहानी


शमां जली, तो परवाने भी होंगे
तेरे हुस्न के, लाखों दीवाने भी होंगे

नज़रें मिली, तो बातें भी होंगी
बातें हुई, तो कहानी भी होगी

कहानी है, तो शुरू भी होगी
शुरू हुई, तो आगे भी बढ़ेगी

बढ़ती है, तो बढ़ने देना
थमती है, ना थमने देना |

Saturday, February 9, 2013

चेहरा


तेरे ख़यालों का ही है ये कोहरा
डाला है जिसने दस्तक पे मेरी डेरा

जगते है सारी रात यादों में तेरी
देखे फिर चाँद या कहें उसे तेरा ही चेहरा

Tuesday, February 5, 2013

ख्वाब


सारी-सारी रात जागे थे, और देखा था खुली आँखो से एक ख्वाब
उगता सूरज देखेंगे, ओढ़ा था कल शाम जिसने पहाड़ो का नकाब

सवेरा हुआ ही था, कि आँख लग गयी, फिर टूटा था एक ख्वाब |

Saturday, January 12, 2013

गुड़िया


इंसान की कल्पना,
और हो गयी रचना
एक सरहद की,
और बँट गयी,
ना सिर्फ़ ये दुनिया
जबकि बँट गया इंसान |

हिंद, पाक, देश-प्रेम, देश-द्रोह,
युध, शांति, आतंक, अमन
पनपी ऐसी कई कल्पनाएं |

और इन कल्पनाओं मे
ना सिर्फ़ कत्ल हुआ
सरहद पे बैठे जवानों का,
इस पार भी, उस पार भी
बल्कि कत्ल हुआ
उन अरमानों का भी
जो घर बैठे
आज भी इंतज़ार करते है
कि पापा छुट्टी पे आएँगे
और इस बार गुड़िया ज़रूर लाएँगे |

Friday, December 28, 2012

मुजरिम, जनता और सवाल


मुजरिम
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क़ैद है, सलाखों के पीछे
पिछले कुछ दशकों से |
गवाह थे, सबूत भी थे
समय के साथ, अब ना रहे

जनता
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इंसाफ़ की माँग कर रही है
पीढ़ी दर पीढ़ी, कचहरी के
चक्कर काटे जा रही है |


सवाल 
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क़ैद है कुछ ज़हन में,
बिल्कुल मुजरिमों की तरह
ज़ुबान तक आते है,
चक्कर काट के चले जाते है
बिल्कुल जनता की तरह |
जिनके पास जवाब थे
वो अब नही रहे ,
सबूतों-गवाहों की तरह |

Monday, December 24, 2012

सचिन तेंदुलकर

खेल वही होगा, मैदान भी वही होंगे
वही 22 गज़ की पट्टी के इर्द गिर्द
नये खिलाड़ी अपनी धाक जमाएँगे 
चौके - छक्के अभी भी लगेंगे 
शतक और भी कई लगेंगे 
रनों की बौछार अभी भी होगी 
कुछ नये रेकॉर्ड बनेंगें,  कुछ टूटेंगें


अगर कुछ नहीं होगा, तो 
10 नंबरी नीली जर्सी में
वो छोटा कद वाला,   
मैदान में वो कोरस गूँज |

नही उठेंगे, कुछ सवाल 
वो खेल रहा है ना अभी तक ?
उसने आज कितने रन बनाये ? 

और हाँ,
शायद उठ जाएगा लोगों का 
'क्रिकेट' धर्म से विश्‍वास |

Saturday, December 22, 2012

कवि - प्रकाशक


कवि महाशय,

ये जो विचार है, थोड़े सस्ते है
कुछ मोती-वोती सजाइए इनमें
तब जाके कुछ भाव लगेंगें
तब जाके किसी बाज़ार मे बिकेंगें |


प्रकाशक महोदय,

गुस्ताख़ी माफ़ करना
जिस बाज़ार में, आदमी बिकता है
उस बाज़ार में बिकने से भला
ये विचार मेरे ज़हन में ही अच्छे है |