बातें है, चलती रहती है
ख़तम ही नहीं होती है
यहाँ वहाँ से, इधर उधर से
आती जाने कहाँ किधर से
मेरी तेरी इसकी उसकी
मीठी कड़वी जाने किसकी
कभी रूलाती कभी हँसाती
नित नये ख्वाब दिखाती
बिना सिर और बिना पाँव के
नये नये रंग रूप बनाती
बातें है, चलती रहती है
चलती रही और एकाएक
रुक गयी ये बातें |
कहाँ गयी वो बातें |
ख़तम ही नहीं होती है
यहाँ वहाँ से, इधर उधर से
आती जाने कहाँ किधर से
मेरी तेरी इसकी उसकी
मीठी कड़वी जाने किसकी
कभी रूलाती कभी हँसाती
नित नये ख्वाब दिखाती
बिना सिर और बिना पाँव के
नये नये रंग रूप बनाती
बातें है, चलती रहती है
चलती रही और एकाएक
रुक गयी ये बातें |
कहाँ गयी वो बातें |
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