Tuesday, September 18, 2012

फ़ासले

सफ़र तो साथ ही शुरू किया था
पर मंज़िल का पता जो ना था 

तुम जो हमे 'आप' कहके पुकारते
नयी दोस्ती में फासलो की हिदायत देते

ख्वाब तो हमने साथ ही देखे थे 
हक़ीकत के मायने जो ना थे 

ख्वाब तो दे दिए, पर नींदे चुरा गये 
सफ़र मे अब कुछ फ़ासले आ गये |

No comments:

Post a Comment